आओ,गौरैया को घर वापस लाए

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घर आंगन में चहकने वाली छोटी सी फुदकने वाली छोटी सी प्यारी चिड़िया गौरैया की चहहाहट हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं अपनी ची ची से प्रकृति को चहकाने वाली यह मासूम अब कम ही दिखाई देती हैं इसकी संख्या में कमी आई तो संरक्षण की पहल भी शुरू हुई प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए गौरैया दिवस मनाया जाता है दिल्ली में 2012 और बिहार ने 2013 मैं गौरैया को संरक्षण देने की पहल शुरू करते हुए इसे राजकीय पक्षी घोषित कर रखा है अच्छी बात यह है कि हालात बदल रहे हैं गुजरात के गांधीनगर में इसी वर्ष 15 से 22 फरवरी को आयोजित 13वें अंतरराष्ट्रीय प्रवासी प्रजाति संरक्षण सम्मेलन में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि भारत में गौरैया की संख्या पहले से बढ़ रही है।

क्यों हुई ओझल

बढ़ता प्रदूषण, आवास में कमी, पेड़ों की घटती संख्या और सब्जी पर अनाज में कीटनाशकों का इस्तेमाल गौरैया की संख्या के कमी के बड़े कारण हैं वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया से जुड़े सुमित सिन्हा बताते हैं कि गौरैया अपने बच्चे को सब्जी और फलों में लगने वाले कीड़े खिलाती है बच्चा अनाज खा नहीं सकता है शुरुआती 10,15 दिनों में कीड़े मकोड़े एकमात्र आधार होते हैं इससे प्रोटीन मिलता है लेकिन जिस तरह की कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा है उनका आरंभिक आहार भी प्रदूषित होकर जहरीला हो गया है पानी की कमी भी एक कारण है गांव या शहर के गली मोहल्लों में नल कुएं तालाब सूख गए हैं आंगन रहे नहीं जहां पानी की खुली टंकी हुआ करती थी इसके चलते खासकर गर्मियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं कंक्रीट के जंगलों में इसके घोसले को उजाड़ दिया है साथ ही पेड़ झाड़ियां तेजी से साफ हो रही है यह अपना आवाज हमारे घरों में बनाती हैं पहले खुले खुले आवाज होते थे अब मकानों में रोशनदान तक नहीं होते हैं तो घोंसला बनाने के लिए जगह भी नहीं मिल पाती वैसे आज भी जिस घर में छेद खोह दिख जाती हैं वहां घोंसला बना लेती हैं या फिर ऐसी कि नीचे मोबाइल टावरों से निकलने वाली सोच में तरंगे कॉपी गौरैया के अस्तित्व के लिए खतरा बताया जाता है हालांकि इस पर अंतिम रिपोर्ट नहीं आई है सरकार ने भी इस आशंका को खारिज किया है वही कुछ संस्थाएं अब तरंगों को दोषी मानती हैं

ऐसी है हमारी दोस्त

घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से पाई जाती है यह हल्के भूरे रंग की होती है इसके अतिरिक्त पूरे विश्व में जहां जहां मनुष्य गया है इसने उसका अनुसरण किया है और अमेरिका के अधिकांश स्थानों अफ्रीका के कुछ स्थानों न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया तथा अन्य नगरीय बस्तियों में अपना घर बनाया शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं। हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेटी स्पैरो, डेड सी स्पैरो और टृ स्पैरो। लोग जहां भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया की जोड़ी वहां रहने पहुंच जाते हैं इसका वैज्ञानिक नाम passeridae है घरेलू गौरैया 46 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ सकते हैं इसका जीवनकाल 3 वर्ष होता है नर गौरैया की पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से की जाती है जबकि मादा के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता है इसे घरेलू गौरैया कहा जाता है क्योंकि आमतौर पर अंडे देने के लिए घरों में या उनके आसपास घोसले बनाती हैं खपरैल का घर इनके लिए बहुत सुरक्षित होता है क्योंकि वहां बड़े हमलावर पक्षियों का खतरा नहीं होता है केवल साप से खतरा होता है बिल्ली भी कभी-कभी झपट्टा मारती है लेकिन जब मादा अंदर रहती है तो नर बाहर रहकर रखवाली करता है।
वीवंडर फाउंडेशन द्वारा गौरैया संरक्षण के क्षेत्र मे की गई पहल
हमनें वीवंडर फाउंडेशन की नींव 14 दिसंबर 2017 को रखी थी।
जैसा कि नाम वीवंडर, जिसका अर्थ घुमक्कड़ होता है, घुमक्कड़ों की टीम जो अलग- अलग जगह घूम- घूम कर कुछ एक स्तर तक समस्याओं के निदान पर विचार कर उसे समाज में एक सार्थक रूप दे।
वीवंडर फाउंडेशन संस्था की नींव इस सोच के साथ शुरू की थी कि अपने व्यस्ततम निजी जिंदगी में से मात्र एक घंटे का समय निकाल कर समाज के कुछ समस्याओं का उद्धार करने प्रयास कर सकेंगे, संस्था का कोई भी सदस्य कही भी रहे कभी भी समाज के लिए एक घण्टे का समय निकाल सके। हालांकि संस्था उस सोच को लेकर आज परस्पर 3 वर्षों से आगे बढ़ रही है, संस्था के सभी सम्मानित सदस्यों ने अब इस सोच को देशब्यापी बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
संस्था का उद्देश्य वातावरण में पक्षियों और उनके आवास का संरक्षण करना है। पक्षी संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता निरपेक्ष है, हम समानता पर विश्वास करते हैं, और संस्था का ऐसा मानना है कि पक्षी और उनके आवासों का संरक्षण मानव सहित अन्य सभी प्रजातियों को किसी ना किसी रूप में लाभ ही पहुंचाता है (पर्यावरण को सुशोभित करते हैं)।
पिछले 3 वर्षों से हम गौरैया संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। हमने लगभग 150 से अलग-अलग स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम सम्पन्नकिया है, और लकड़ी से बने लगभग 7000 से अधिक पक्षियों के घोंसले वितरित किया हैं। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हमने विभिन्न स्थानों पर 15000 से अधिक पौधारोपण किया है। संस्था महिला सशक्तिकरण और बाल शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रही है। संस्था ने निशुल्क चिकित्सा शिविर, वस्त्रदान, रक्तदान, मलिन बस्तियों में शिक्षा से जुड़ी जरूरी सामाग्री व खाद्यान सामाग्री भी वितरित किया है।
संस्था को गौरैया संरक्षण के लिए राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार 2019 और विभिन्न संगठन से 10 अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया है।
मै (गोपाल कुमार- चेयरमैन वीवंडर फाउंडेशन) जब याद करता हूं, बचपन में जब हम छत पर सोया करते थे सुबह सुबह चिड़ियों की चहचहाने ने की आवाज हमारे कानों में आती थी और हमारी नींद खुल जाया करती थी, लेकिन अब जब छत पर बैठते हैं या सोते हैं तो उनकी आवाज नहीं आती है, इसकी वजह क्या है! मुझे लगता है वजह हम सभी हैं, हम सब जिम्मेदार हैं इसके, इस देश का इस राष्ट्र का तथा विश्व का प्रत्येक प्राणी इस बात का जिम्मेदार है कि आपके सुविधाओं की वजह से पशु पक्षियों को नुकसान पहुंच रहा है, हम सबको यह बात बहुत बारीकी से समझ लेनी चाहिए और उस पर विचार करना चाहिए कि क्या हम स्वार्थी हो गए हैं, ऐसा माना जाता है कि 84 लाख़ योनियों में से एक योनि में मानव का जीवन होता है, क्या हमने इस महत्वपूर्णता को बनाए रखा, क्या हमने कभी सोचा कि हमारी सुख सुविधाओं की वजह से किस- किस को नुकसान पहुंच रहा है। अभी हाल ही में कुछ दिन पहले ऑस्ट्रेलिया के जंगल में आग लग गई थी जहां कई हजार पशु पक्षी जानवर जल गए, राख हो गए मैं 2 दिन तक सो नहीं पाया मैं सोचता रहा कि कैसे मदद कर सकते हैं, हम यहां बैठे थे इतने दूर बैठे थे हमारे हाथों में कुछ भी मुमकिन नहीं था, हम बहुत भावुक थे मेरी पूरी टीम भावुक थी, अफ़सोस इस बात का था कि हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं तो क्यों ना हम एक ऐसी चैन बनाएं क्यों ना हम एक ऐसे रास्तों को चुने जिसमें हम सभी एक साथ आकर हम सभी आज यह प्रण लें कि इस पृथ्वी पर जन्में पशु- पक्षी व 1- 1 प्राणी का ध्यान रखेंगे।
विचार कीजिएगा क्या हमनें अपने पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं।

अंत में आप सभी से एक ही निवेदन है कि आप घर में या घर के आस पास एक घोसला जरूर रखें और एक पौधों भी लगाए, और अपने साथ साथ बाकी के अपने साथियों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें, ऐसा कर पर्यवारण संरक्षण के मुहिम में अपनी सहभगिता दर्ज करें।

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