कुख्यात विकास दुबे का इतिहास

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विकास की खूनी दास्तान जानने के लिए आज से दो दशक पूर्व चलना होगा, जहां विकास ने अपना खूनी इतिहास लिखना शुरू किया था। वर्ष 2000 की बात है, विकास ताराचंद इंटर कालेज में पढ़ाई किया था। वहीं के प्रिंसिपल थे सीधेश्वर पाण्डेय, विकास औऱ सीधेश्वर के बीच एक प्लाट को लेकर विवाद चल रहा था। जब विकास को लगा कि प्लॉट पाने में सीधेश्वर रोड़ा बन रहे हैं, तब विकास अपने साथियों के साथ नम्बर 2000 में अपने शिक्षक सीधेश्वर पांडेय की हत्या कर देता है। उसके बाद विकास दुबे पूरे कानपुर में अपनी आपराधिक सल्तनत कायम करने लगा।

उसके रास्ते का रोड़ा बन रहे थे तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष लल्लन बाजपेयी और लल्लन का साथ दे रहे थे उस तत्कालीन दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला। बताया जाता है कि अक्सर विकास के विपरीत संतोष शुक्ला रहते थे। इसलिए वह उनसे चिढ़ा हुआ था। मंत्री संतोष शुक्ला कानपुर देहात के शिवली थाने के अंदर बैठे थे। विकास दुबे ने वर्ष 2001 में थाने के अंदर घुसकर संतोष शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी औऱ आश्चर्य की बात यह कि उस वक्त बीजेपी की सरकार रहते हुए एक मंत्री की हत्या हो जाती है। मगर लचर कानून के चलते विकास का गिरेहबान कानून की पकड़ से बाहर हो जाता है और वह छूट जाता है।

वर्ष 2004 में केबिल व्यवसायी दिनेश दुबे की हत्या करके। बताया जाता है कि उस वक्त उसके साथियों का केबल व्यवसायी दिनेश से कारोबारी मनमुटाव था। इसके बाद विकास दुबे ने अपराध जगत में मुड़कर नहीं देखा। अब तक विकास अपराध और सियासत के गठजोड़ से वाकिफ़ हो गया था। उसके सियासी रहनुमा उसे संरक्षण देते रहे और वह जमीन कब्जाने से लेकर हर तरह के अपराध करता रहा। जैसे-जैसे उसके अपराध की फाइलें मोटी होती रहीं, वैसे-वैसे उसका दुस्साहस बढ़ता गया। यहां तक कि वह पुलिस तंत्र में भी अपनी घुसपैठ बनाकर सूचना पाता रहा, जैसा कि मिडिया रिपोर्ट कह रहे हैं।

विकास की खूनी दास्ताँ बेहद भयावह ही नहीं बेहद लंबी भी है। खुद को रॉबिन हुड की तरह प्रचारित कर विकास जिला पंचायत सदस्य भी रह चुका है। उसकी किले नुमा हवेली जिसे पुलिस ने तोड़ दिया उसकी काली कमाई और शातिराना सोच की गवाह है। मगर अफसोस जिस विकास का विनाश 2001 के बीजेपी सरकार में मंत्री की हत्या के बाद हो जाना चाहिए था, वह 2020 तक खाकी और खादी के साथ गठजोड़ बना कर फलता फुलता रहा । खादी पर गोलियां चलाने वाले कुख्यात विकास का विनाश पहले ही हो गया होता, तो आज खाकी वालों के दस घरों से करुण क्रदन की आवाज नहीं आती।

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