खादी और खाकी के म्यान से निकली तलवार, किरकिरी उड़ाने के साथ दोनों पक्षों पर लगाया सवालिया निशान

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वाराणसी। खादी और खाकी का साथ कभी गहरा जाता है,तो कभी विवादों में आ जाता है। अक्सर दोनों एक दूसरे के रहनुमाई करते नजर आते हैं। मगर जब भिड़ते हैं,तो एक दूसरे के खिलाफ हर दावँ आजमाते हैं। एक दूजे को नुकसान पहुचाने के लिए किसी भी हद तक उतर जाते हैं।
लंका पुलिस और सत्ताधारी दल के नेताओं का विवाद भी कुछ इसी तरह हैं।

बीते शुक्रवार को लंका थाने के सुंदरपुर चौकी प्रभारी सुनील गौड़ और बीजेपी नेता सुरेंद्र पटेल औऱ उनके बेटे विकास पटेल से मास्क न लगाये जाने के मामूली विवाद ने एक बड़ा बखेड़ा कर दिया। हालत यह हुई कि हाथापाई खींचतान के बाद जो मारपीट में तब्दील हो गया।

उसके बाद पुलिस आक्रोश में अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए मारपीट खींचतान की मामूली धारा को संगीन धाराओं में तब्दील कर दिया।

इसपर बीजेपी के स्थानीय वरिष्ठ नेताओं ने आपत्ति जाहिर करते हुए अधिकारीयों को दबाव में ले लिया। लिहाजा आम नागरीकों के मामलों पर टालू रवैया अपनाने वाले अधिकारियों ने आनन फानन में जांच बिठा के गम्भीर धाराओं को हटा दिया।

मगर बीजेपी नेताओं ने जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई को अपने नाक औऱ साख का सवाल बना लिया। अंततः हुआ वही जो सत्तापक्ष के नेताओ से टकराव पर पुलिस वालों का होता है। लंका थाना प्रभारी अश्विनी चतुर्वेदी,समेत पाँच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया।

पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो तिल को ताड़ इस तरह बनाया गया। जिसे सामान्य बातचीत से रोका जा सकता था।

1-अगर छात्रनेता विकास पटेल या उसके साथी मास्क नहीं लगाएं थें तो बजाय बहस के पुलिस मास्क न लगाने पर जुर्माना कर सकती थी। या नसीहत देकर बख्स देती।
वहीं विकास पटेल मास्क न लगाने पर बजाय पुलिसकर्मियों से बहस के गलती स्वीकार कर सकते थें। और भुलवश हुआ न मास्क नही लगाए यह बता सकतें थे। क्योंकि मास्क के लिए पूछना पुलिस की ड्यूटी है।

2- बीजेपी नेता सुरेंद्र पटेल चाहते तो सरकार औऱ खुद कि किरकिरी कराने की बजाय। माहौल को समझाबुझाकर शांत कर सकते थें। वहीं थानाप्रभारी अश्विनी चतुर्वेदी भी मामले को नॉर्मल करने के लिए अधीनस्थों को समझाते हुए विवाद में गम्भीर धाराओं की जगह सिर्फ शांतिभंग मारपीट वाली ही धारा लगा सकतें थें।

मगर दोनों को (खादी खाकी) को अपनी ताकत का अहं था। दोनों ने अपने अपने दावँ आजमाया। मगर सत्ता के अर्दब में तो अंततः खाकी ही आया।

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