कुख्यात विकास के अंत से कई सवालात रह गये अधूरे! वरना कइयों के चेहरे से उठते नकाब पूरे

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अपने साथियों के एक एक कर पुलिस के गोली का शिकार होता देख कुख्यात विकास दुबे ने मध्यप्रदेश के उज्जैन में सरेंडर कर दिया था। उसे लगा था कि वह सरेंडर के बाद सेफ बच जाएगा। मगर उसके सरेंडर के ही समय से यह कयास लगने लगे थें की विकास दुबे यूपी में एंट्री करते ही उसे उसके मूल अंजाम तक पहुँचा दिया जाएगा। और वही हुआ अंततः विकास दूबे हिरासत से भागने के प्रयास में मारा गया। पुलिस के मुताबिक एसटीएफ की गाड़ी उसे कानपुर ला रही ला रही थी,अचानक से एक गाड़ी पलट गई। और विकास ने पुलिस से असलहा छीनकर भागने की कोशिश की। जिसके बाद पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया है। पुलिस की कहानी में कोई नयापन नहीं है,सब कुछ वैसे ही जैसे अधिकतर मुठभेड़ के बाद बताया जाता है। हालांकि अपराधियों का मनोबल और भरम तोड़ने के लिए विकास और उस जैसे अपराधियों का खात्मा जरूरी है। मगर विकास के मारे जाने के बाद कई सफेदपोशों के चेहरे बेनकाब होने से बच गयें हैं,या बचा लिए गयें हैं। विकास जीवित होता तो बताता की उसे किस किस नेताओं ब्यूरोक्रेट्स का संरक्षण प्राप्त था। वह यह भी बताता की स्थानीय पुलिस किस तरह उसकी मदद करती थी,और उसके एवज में वह क्या लेती थी। जिस एमपी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा से उसे जोड़कर उन्हें आरोपित किया जा रहा है। उसमें कितनी सच्चाई है। मगर यह सब सवाल अनुत्तरित रह गयें। अगर पुलिस रास्ते भर में उगलवा भी ली होगी तो यह सब सच्चाई सामने आने की सम्भावना कम ही है। अगर आ भी गयी तो आधी अधूरी ही होंगी।

खैर, एक धारणा है कि पुलिस जब अपने पर उतर आती है तो,बड़े से बड़े अपराधियों को अतीत बना देती है। और पुलिस तभी किसी अपराधी के नेस्तनाबूदी कि तरफ कदम बढ़ाती है,जब वह अपराधी खाकी की तरफ नजरें टेढ़ी करके देखता है।
ढाई दशक से अपराध का काला साम्राज्य स्थापित कर कानपूर और आसपास के जिलों में राज करने वाले कुख्यात विकास दुबे और उसके कुनबे का पूरी तरह से विनाश हो गया। जुर्म के स्याह पन्नों पर विकास दुबे के विनाश की पूरी कहानी मात्र हफ्ते भर में लिख गयी। वरना कई कुख्यात अपराधी आज भी सक्रिय हैं। और कई माफिया से माननीय बन गए हैं।

विकास के लाश के साथ उन नेताओं का इतिहास भी खाक हो जाएगा,जो अपराध और अपराधियों को अपने निजी फायदे के लिए पोषित करते हैं।

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